संदेश

मुस्कुरा दो ना

नमस्ते दोस्तों, जीवनसाथी अगर आपसे बहुत प्यार करे और जताये ना तो बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। अगर हम किसी की फिक्र करते है तो हमे ये इज़हार भी करना चाहिए। कभी - कभी प्यार से बोला गया दो शब्द जादुई असर करता है। इसलिए इज़हार करना सीखिए, कभी प्यार से मुस्कुरा के देखिये, आपका प्यार और बढ़ेगा.........   “मुस्कुरा दो ना”   जब इतनी वफ़ा करते हो तो क्यों मुझसे नहीं जताते हो मैं लगा टकटकी बैठी हूँ मुझे देख नहीं मुस्कुराते हो तुम क्यों नहीं मुस्कुराते हो?   मैं पागल - पागल फिरती हूँ तुम बदहवास से रहते हो मैं जान छिड़कती हूँ तुम पर तुम बिलकुल नहीं समझते हो।   जब करते हो परवाह मेरी क्यूँ मुझसे नहीं बताते हो मैं लगा टकटकी बैठी हूँ मुझे देख नहीं मुस्कुराते हो तुम क्यों नहीं मुस्कुराते हो?   हर एक शाम घड़ी पर ही मैं नज़र टिकाये रहती हूँ, तुम आओगे कब ऑफिस से मैं पलक बिछाए रहती हूँ।   मुझे घर में तुमने जगह दिया पर दिल में नहीं बसाते हो। मैं जान छिड़कती हूँ तुम पर मुझे देख नहीं मुस्कुराते हो तुम क्यों नहीं मुस्कुराते हो? ...

वो बेचारी गईया

नमस्ते दोस्तों, एक बार एक दुर्बल और आंशिक रूप से घायल गाय मुझे और मेरे दोस्त को दिखी, वो बहुत ही करुण नजरों से हम दोनों को देख रही थी।   वो भूखी, प्यासी और बेहद ही कमजोर दिख रही थी। उसे तुरंत हमारे मदद की जरुरत थी, वो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। किसी ने उस पर बहुत जुल्म किया था। हमने रोज उसे रोटी देना शुरू किया और अब वो स्वस्थ है। मै आज अपनी इस रचना के माध्यम से आप सबसे अपील करना चाहती हूँ कि हर जीव पे दया करे   और उनकी मदद करे.......   “वो बेचारी गईया”   थी टहल रही मैं सुबह - सुबह बह रही थी शीतल मंद बयार खुशनुमा था मौसम बाहर का थी मेरी सहेली भी मेरे साथ, दरख्तों के बीच में से थे, मुझे घूर रहे दो चक्षु निरीह, हुई बेचैनी हम दोनों को चले गए हम उसके करीब।   थी दुर्बल, घायल, निरीह वो अस्थि - पंजर सा उसका तन रंग था एकदम सफ़ेद उसका जैसे हो ओढ़े मौत का कफ़न अन्धकार कि गुहा सरीखी उन आँखों से हुआ विचलित मन   भरा था उन आँखों में अतिशय दारुण अपार - दुःख का नीरव रोदन वो तो एक घायल गईया थी लिए आँखों में भीषण सूनापन असंख्य ...

मैं भी कवि ना बन जाऊं

नमस्ते दोस्तों, मैं जब भी शांत होती हूँ तब मेरे मन में नयी - नयी कविता का सृजन होने लगता है।   यूँ तो कवि बनना मेरे लिए गौरव की बात है पर फिर भी कभी - कभी डर लगता है क्युकि एक कवि वही लिखता है जो वो महसूस करता है, मै कभी किसी को आहत ना कर दूँ बस इस बात की घबराहट मुझको होती है।   “मैं भी कवि ना बन जाऊं”   हर रोज निशा जब आती है नीरवता आँचल फैलाती है , पलकें जब मैं झपकाती हूँ जब भी मै सोना चाहती हूँ   तब कई अजीब सवालों में मै उलझ उलझ रह जाती हूँ मैं भी कवि ना बन जाऊं , बस इस बात से मैं घबराती हूँ। इस बात से मैं घबराती हूँ।।   जब भी मैं तनहा होती हूँ जब   चारो   तरफ   सन्नाटा   है , तब - तब   शब्दों   का   मायाजाल मेरे अंतर्मन पर छाता है   मैं झट से कलम उठाती हूँ जीवन के हर एक पहलू पर मै नयी रचना बनाती हूँ , मैं भी कवि ना बन जाऊं बस इस बात से मै घबराती हूँ। इस बात से ही घबराती हूँ।।   मु...